सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यताओं में से एक थी, जिसका विकास लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व के बीच हुआ। यह सभ्यता मुख्यतः सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे फैली हुई थी। इसके प्रमुख नगरों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल और कालीबंगा शामिल थे, जो आज के भारत और पाकिस्तान के क्षेत्रों में स्थित थे।
इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सुव्यवस्थित नगर योजना थी। यहाँ के शहर ग्रिड प्रणाली (जालीनुमा ढाँचे) पर बसे हुए थे, जहाँ सड़कों का निर्माण सीधी रेखाओं में किया गया था। घर पक्की ईंटों से बने होते थे और लगभग हर घर में स्नानघर तथा जल निकासी की व्यवस्था होती थी। मोहनजोदड़ो में स्थित ‘महान स्नानागार’ इस सभ्यता की उन्नत स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सिंधु घाटी सभ्यता के लोग कृषि और व्यापार में कुशल थे। वे गेहूँ, जौ, चावल आदि फसलें उगाते थे और कपास का उत्पादन करने वाले विश्व के पहले लोगों में से थे। व्यापार के लिए वे मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं से संपर्क रखते थे। इस सभ्यता में तौल और माप की सटीक प्रणाली विकसित थी, जिससे व्यापार सुचारु रूप से चलता था।
धार्मिक जीवन की बात करें तो यहाँ के लोग प्रकृति पूजा करते थे। मातृ देवी (Mother Goddess) और पशुपति (भगवान शिव का प्रारंभिक रूप) की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। मुहरों (seals) पर बने चित्र और चिन्ह उनकी धार्मिक आस्था और जीवन शैली को दर्शाते हैं। हालांकि उनकी लिपि अभी तक पूरी तरह पढ़ी नहीं जा सकी है, जिससे उनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करना कठिन है।
इस सभ्यता के पतन के कारणों पर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा या भूकंप का परिणाम मानते हैं, जबकि कुछ लोग आर्यों के आक्रमण या जलवायु परिवर्तन को इसका कारण बताते हैं।