मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख और अत्यंत विकसित नगर था, जिसका अर्थ है “मृतकों का टीला” (Mound of the Dead)। इसकी खोज 1922 ई. में हुई थी और यह वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है। यह नगर प्राचीन काल में शहरी जीवन, वास्तुकला और तकनीकी उन्नति का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सुव्यवस्थित नगर योजना थी। यह शहर ग्रिड प्रणाली पर आधारित था, जहाँ चौड़ी सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। यहाँ के मकान पक्की ईंटों से बने होते थे और लगभग हर घर में स्नानघर तथा जल निकासी की उन्नत व्यवस्था थी। नालियों को ढककर बनाया गया था, जिससे सफाई और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता था।
इस नगर का सबसे प्रसिद्ध निर्माण “महान स्नानागार” (Great Bath) है, जो एक विशाल जल कुंड था और संभवतः धार्मिक या सामाजिक अनुष्ठानों के लिए उपयोग किया जाता था। इसके अलावा यहाँ बड़े-बड़े अनाज भंडार, सभा भवन और कुएँ भी पाए गए हैं, जो उस समय की उन्नत प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था को दर्शाते हैं।
मोहनजोदड़ो के लोग कृषि, व्यापार और शिल्पकला में अत्यंत निपुण थे। वे गेहूँ, जौ जैसी फसलें उगाते थे और धातु, मिट्टी तथा पत्थर से विभिन्न वस्तुएँ बनाते थे। यहाँ से प्राप्त कांस्य की प्रसिद्ध मूर्ति “नर्तकी” (Dancing Girl) और पुजारी की मूर्ति उनकी कला कौशल का प्रमाण हैं। व्यापार के लिए उनका संपर्क मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन सभ्यताओं से भी था।
हालांकि मोहनजोदड़ो की लिपि अभी तक पूरी तरह पढ़ी नहीं जा सकी है, फिर भी मुहरों, मूर्तियों और अवशेषों से यह स्पष्ट होता है कि यह एक समृद्ध और संगठित समाज था। इसके पतन के कारणों पर मतभेद हैं, जिनमें बाढ़, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएँ प्रमुख मानी जाती हैं।
संक्षेप में, मोहनजोदड़ो प्राचीन भारत की उन्नत शहरी संस्कृति, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक संगठन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आज भी इतिहास और पुरातत्व के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।