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निलांबर सिंह और पितांबर सिंह खरवार : झारखंड के स्वाभिमान के अमर प्रतीक

निलांबर सिंह और पितांबर सिंह खरवार

झारखंड की धरती केवल प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संपदा के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह भूमि सदियों से वीर योद्धाओं, जननायकों और क्रांतिकारियों की जन्मस्थली रही है। जब-जब भारत की आज़ादी का इतिहास लिखा जाता है, तब-तब झारखंड के आदिवासी वीरों का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है।

इन्हीं महान वीरों में निलांबर और पितांबर का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। ये दोनों भाई 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड क्षेत्र से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खड़े होने वाले प्रमुख जनजातीय क्रांतिकारी थे। उनका संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं था, बल्कि यह जनजातीय सम्मान, भूमि अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए था।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

निलांबर और पितांबर का जन्म वर्तमान झारखंड राज्य के पलामू प्रमंडल (अब गढ़वा जिला) के चेमो–सनेया गांव में हुआ था। वे खरवार जनजाति से संबंधित थे, जो उस समय अपने साहस, आत्मसम्मान और स्वतंत्र प्रवृत्ति के लिए जानी जाती थी।

उनके पिता चेमू सिंह एक स्थानीय जमींदार थे, लेकिन वे अन्य जमींदारों की तरह अत्याचारी नहीं थे। वे गरीब किसानों और आदिवासियों के प्रति सहानुभूति रखते थे। कई बार वे किसानों से लगान माफ कर देते थे या बहुत कम लगान लेते थे।

निलांबर सिंह और पितांबर सिंह खरवार
निलांबर सिंह और पितांबर सिंह खरवार के वंशजों के साथ, फाइल फोटो

यही कारण था कि चेमू सिंह और उनका परिवार धीरे-धीरे ब्रिटिश प्रशासन की आंखों की किरकिरी बन गया। निलांबर और पितांबर ने बचपन से ही अपने पिता के इन आदर्शों—न्याय, करुणा और अन्याय के विरोध—को आत्मसात किया।

विषयविवरण
जन्म स्थानचेमो–सनेया गांव, पलामू (अब गढ़वा), झारखंड
पिताचेमू सिंह
मातासनया देवी
समुदाय/ जातिखरवार
संघर्ष काल1857–1859
आंदोलन1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति

1857 की क्रांति और विद्रोह की पृष्ठभूमि

साल 1857 भारतीय इतिहास का वह मोड़ था, जब देश के विभिन्न हिस्सों में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ व्यापक विद्रोह भड़क उठा। इस क्रांति का प्रभाव केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि झारखंड के जंगलों, पहाड़ियों और गांवों तक भी पहुंचा।

झारखंड में पहले से ही अंग्रेजों की नीतियों—जमीन छिनना, जबरन लगान, वन कानून और सामाजिक शोषण—के खिलाफ असंतोष व्याप्त था। निलांबर और पितांबर ने भी खुला विद्रोह करने का निश्चय किया।

उन्होंने आसपास के गांवों में जाकर आदिवासियों, किसानों और युवाओं को संगठित किया। देखते ही देखते लगभग 500 से अधिक लोगों की एक सशस्त्र सेना तैयार हो गई।

अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष

1. चैनपुर पर आक्रमण (21 अक्टूबर 1857)

निलांबर और पितांबर ने अंग्रेजों के समर्थक जमींदार रघुवर दयाल के घर पर आक्रमण कर अपने विद्रोह की शुरुआत की। यह हमला चैनपुर में हुआ और यह स्पष्ट संदेश था कि अब झारखंड की जनता अंग्रेजी अत्याचार को बर्दाश्त नहीं करेगी।

यह घटना पूरे क्षेत्र में विद्रोह की चिंगारी बन गई।

2. लेस्लीगंज की लड़ाई

इसके बाद इन दोनों भाइयों ने अपनी सेना के साथ लेस्लीगंज पर धावा बोला। यहां अंग्रेजी फौज को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट ग्राहम की अगुवाई में सेना भेजी गई, लेकिन निलांबर–पितांबर की रणनीति और स्थानीय भूगोल की समझ के आगे अंग्रेजों को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा।

3. पलामू किला और निर्णायक संघर्ष

विद्रोह की तीव्रता को देखते हुए ब्रिटिश कमिश्नर ई. एल. डाल्टन ने मद्रास रेजीमेंट के साथ पलामू पर आक्रमण किया।

पलामू किला निलांबर और पितांबर का मुख्य गढ़ था। प्रारंभ में उन्होंने अंग्रेजों को रोके रखा, लेकिन आधुनिक हथियारों और बड़ी सेना के सामने वे अधिक समय तक टिक नहीं पाए। अंततः किला अंग्रेजों के हाथ चला गया।

जंगलों में गुरिल्ला युद्ध

किले के पतन के बाद भी निलांबर और पितांबर ने आत्मसमर्पण नहीं किया। उन्होंने झारखंड के घने जंगलों में जाकर गुरिल्ला युद्ध की नीति अपनाई।

छोटे-छोटे दल बनाकर अचानक हमले करना, फिर जंगलों में विलीन हो जाना—यह रणनीति अंग्रेजों के लिए बड़ी समस्या बन गई। लेकिन लगातार पीछा, मुखबिरी और संसाधनों की कमी के कारण अंततः दोनों भाई पकड़ लिए गए।

गिरफ्तारी और शहादत

अंग्रेजी शासन ने विद्रोह को कुचलने के उद्देश्य से कठोर कदम उठाए।
28 मार्च 1859 को निलांबर और पितांबर को लेस्लीगंज में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई।

जिस स्थान पर उन्हें फांसी दी गई, वह आज भी “बलिदानी कुआं” के नाम से जाना जाता है। यह स्थल झारखंड के इतिहास में शौर्य और बलिदान का प्रतीक बन चुका है।

निलांबर–पितांबर की विरासत और सम्मान

निलांबर–पितांबर विश्वविद्यालय

झारखंड सरकार ने इन वीरों की स्मृति में निलांबर–पितांबर विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो जनवरी 2009 में मेदिनीनगर (पलामू) में स्थापित हुआ। यह विश्वविद्यालय झारखंड के युवाओं को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाने का कार्य कर रहा है।

IIM रांची में सम्मान

साल 2024 में भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) रांची ने अपने दो प्रमुख भवनों का नाम

  • निलांबर ब्लॉक
  • पितांबर ब्लॉक
    रखकर इन क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि दी।

निलांबर और पितांबर, वे झारखंड की जनजातीय चेतना, स्वतंत्रता की आकांक्षा और आत्मसम्मान के प्रतीक थे।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि

सच्चा संघर्ष वही होता है, जो अन्याय के विरुद्ध और समाज के सम्मान के लिए किया जाए।

आज भी झारखंड की मिट्टी उनके बलिदान की गाथा सुनाती है और आने वाली पीढ़ियों को साहस, एकता और स्वाभिमान का संदेश देती है।