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पुणे की सियासत में गरमाहट, अजित पवार की लड़ाई ने दिलाई 2017 की BJP-शिवसेना टकराव की याद

पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव से पहले अजित पवार और भाजपा के बीच बढ़ता राजनीतिक टकराव 2017 में मुंबई में हुए BJP-शिवसेना संघर्ष की याद दिला रहा है। जानिए पूरा राजनीतिक घटनाक्रम।

महाराष्ट्र में एक बार फिर स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सियासी पारा चढ़ता नजर आ रहा है। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव के मद्देनजर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता और उपमुख्यमंत्री अजित पवार तथा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है। यह टकराव 2017 में मुंबई और ठाणे नगर निगम चुनावों के दौरान भाजपा और शिवसेना के बीच हुए खुले संघर्ष की याद दिला रहा है।

अजित पवार ने हाल के दिनों में भाजपा पर सीधा हमला बोलते हुए नगर निगमों में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और आम जनता के हितों की अनदेखी जैसे आरोप लगाए हैं। पवार का कहना है कि स्थानीय निकायों में सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा जनसमस्याओं को हल करने में विफल रही है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, अजित पवार की यह आक्रामक रणनीति केवल नगर निगम चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पुणे क्षेत्र में NCP की राजनीतिक जमीन को मजबूत करना भी है। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ लंबे समय से महाराष्ट्र की राजनीति में बेहद अहम माने जाते रहे हैं और यहां का परिणाम आने वाले विधानसभा व लोकसभा समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

भाजपा की ओर से पवार के आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि उनकी सरकार और नगर निगमों ने विकास कार्यों को प्राथमिकता दी है और विपक्ष चुनाव से पहले बेबुनियाद आरोप लगाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति काफी हद तक 2017 जैसी है, जब सहयोगी दल होने के बावजूद भाजपा और शिवसेना एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक चुनावी लड़ाई में उतर आए थे। उस टकराव ने आगे चलकर महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव की नींव रखी थी।

अब सभी की नजरें पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के चुनावी नतीजों पर टिकी हैं। यह चुनाव न सिर्फ स्थानीय सत्ता का फैसला करेंगे, बल्कि यह भी संकेत देंगे कि महाराष्ट्र की राजनीति में आने वाले समय में गठबंधन और समीकरण किस दिशा में जा सकते हैं।